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Friday, 9 September 2016

आर्युवेदिक रोग निदान☘ हरी मिर्च में एक औषधी के समान है.

आर्युवेदिक रोग निदान..
हरी मिर्च में एक औषधी के समान है जिसमें शरीर के कई बीमारियों दूर करता है। हरी मिर्च में कई सारी स्वास्थ्य वर्धक गुण समाएं होते हैं, साथ ही हरी मिर्च में विटामिन सी, फाइबर्स, एंटी-बैक्टीरियल आदि गुण हैं। तो आइये जानते हैं आगे की स्लाइड्स पर तीखी हरी मिर्च के अनोखे लाभ के बारे में…
हरी मिर्च में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेट्स फ्री रैडीकल्स से शरीर की कोशिकाओं को पहुंंचने वाले नुकसान से रक्षा करने में मदद करती हैं।
शोध के अनुसार-हरी मिर्च में एंटीऑक्सीडेंट होता है जो कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है और कैंसर से लडने में मददगार साबित होती है।
हरी मिर्च में मौजूद तत्वों से त्वचा साफ बनी रहती है और कील-मुंहासे नहीं होते हैं।
हरी मिर्च डाइटरी फाइबर का एक बेस्ट स्त्रोत होते हैं जो शरीर में से विषैले तत्व बाहर निकालने में मददगार साबित होती हैं।
हरी मिर्च में विटामिन ए से भरपूर हरी मिर्च आंखों और त्वचा के लिए भी काफी लाभकारी है।
वजन घटाने में मददगार-
मिर्च के सेवन से भूख कम लगती है और बार-बार खाने की इच्छा नहीं होती जिससे वजन बढने का खतरा कम ही रहता है।                         

स्वस्थ रहें..................

स्वस्थ रहें
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1-- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।

2-- कुल 13 अधारणीय वेग हैं |

3--160 रोग केवल मांसाहार से होते है |

4-- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।

5-- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।

6-- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।

7-- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।

8-- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।

9-- ठंडे जल (फ्रिज) और आइसक्रीम से बड़ी आंत सिकुड़ जाती है।

10-- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।

11-- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।

12-- बाल रंगने वाले द्रव्यों (हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।

13-- दूध (चाय) के साथ नमक (नमकीन पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।

14-- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।

15-- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।

16-- टाई बांधने से आँखों और मस्तिश्क हो हानि पहुँचती है।

17-- खड़े होकर जल पीने से घुटनों (जोड़ों) में पीड़ा होती है।

18-- खड़े होकर मूत्र-त्याग करने से रीढ़ की हड्डी को हानि होती है।

19-- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।

20-- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।

21-- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।

22-- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय (टीबी) होने का डर रहता है।

23-- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है, मलेरिया नहीं होता है।

24-- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।

25-- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।

26-- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।

27-- हृदय-रोगी के लिए अर्जुन की छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी, सेंधा नमक, गुड़, चोकर-युक्त आटा, छिलके-युक्त अनाज औशधियां हैं।

28-- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।

29-- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।

30-- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।

31-- जल सदैव ताजा (चापाकल, कुएं आदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।

32-- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।

33-- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।

34-- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।

35-- भोजन पकने के 48 मिनट के अन्दर खा लेना चाहिए। उसके पश्चात् उसकी पोशकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।

36-- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोशकता 100%, कांसे के बर्तन में 97%, पीतल के बर्तन में 93%, अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।

37-- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।

38-- 14 वर्श से कम उम्र के बच्चों को मैदा (बिस्कुट, बे्रड, समोसा आदि) कभी भी नहीं खिलाना चाहिए।

39-- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेश्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।

40-- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।

41-- सरसों, तिल, मूंगफली या नारियल का तेल ही खाना चाहिए। देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।

42-- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।

43-- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।

44-- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है। हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।

45-- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी (कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।

46-- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।

47-- बर्तन मिटटी के ही परयोग करन चाहिए।

48-- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे। (आँखों के रोग में दातून नहीं करना)

49-- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़े और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है।

50-- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद और अच्छा (ताजा) भोजन अत्यन्त आवश्यक है।

51-- देर रात तक जागने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है। भोजन का पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता है आँखों के रोग भी होते हैं।

52-- प्रातः का भोजन राजकुमार के समान, दोपहर का राजा और रात्रि का भिखारी के समान।

आशा है स्वयं के परिवार में भी इसे लागु करेंगे।

Wednesday, 7 September 2016

कैंसर सहित कई बीमारियों के लिए गौ-मूत्र रामबाण.

कैंसर सहित कई बीमारियों के लिए गौ-मूत्र रामबाण.
हिंदू धर्म शास्त्रों में गाय को ‘मां’ के रूप में पूजा जाता है. जर्मन के एक वैज्ञानिक अनुसार गौ-मूत्र सुबह खाली पेट पीने से कैंसर ठीक हो जाता है.
हिंदू धर्म शास्त्रों में गाय को माता कहा गया है. हिंदू धर्म में यह विश्वास है की गाय प्राकृतिक कृपा की प्रतिनिधि है इसलिए इस की पूजा व रक्षा हर हिंदू का धर्म है.
वैदिक मान्यताओं के अनुसार गाय के शारीर में 33 करोड़ देवता वास करते है इसलिए गौ सेवा करने से सभी 33 करोड़ देवता खुश होते है.
गाय एक शुद्धता सरलता, सौम्यता और सात्विकता की मूर्ति है. गौ माता की पीठ में ब्रह्म, गले में विष्णु तथा मुख में रूद्र निवास करते है. मध्यम भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी मह्रिषी  वास करते है श्री कृष्ण को हम गोपाल कृष्ण गोविन्द कहते है अर्थात गौ के पालनहार.
गौ-माता पृथ्वी, ब्रहृामण और देव की प्रतीक है. गौ रक्षा, गौ संवर्धन हिन्दुओं के आवश्यक कर्त्तव्य माने जाते है. सभी प्रकार दान में गौ-दान सर्वोपरि माना जाता है.
गौ माता की सेवा के वैज्ञानिक आधार-औषधीय गुण
1. गौ-माता का दूध अमृत के सामान है. इनके दूध से दूध घी, माखन से मानव शारीर पुष्ट होता है और बूढी तीव्र होती है.
2. गौ-माता के दूध से चुस्ती, स्फूर्ति एवं सकारात्मकता बनी रहती है.
3. गौ-माता का मूत्र पीने से कैंसर एवं टी.बी जैसी भयंकर बिमारियां दूर होती                      
गाय एवं गाय के विज्ञान से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले कुछ प्रश्नोत्तर यहाँ दिये गए है| अगर आपके मन में इन प्रश्नों के अलावा भी कोई प्रश्न आए तो आप इस पेज पर कमेंट के रूप में हम से पूछ सकते है| आपके द्वारा पूछे गए अच्छे प्रश्नों को हम यहाँ जोड़ कर सभी के लिए उसका उत्तर उपलब्ध करवाएँगे|

गाय क्या है?

गाय ब्रह्मांड के संचालक सूर्य नारायण की सीधी प्रतिनिधि है| इसका अवतरण पृथ्वी पर इसलिए हुआ है ताकि पृथ्वी की प्रकृति का संतुलन बना रहे| पृथ्वी पर जितनी भी योनियाँ है सबका पालन-पोषण होता रहे| इसे विस्तृत में समझने के लिए ऋगवेद के 28वें अध्याय को पढ़ा जा सकता है|

गौमाता और विदेशी काऊ में अंतर कैसे पहचाने?

गौमाता एवं विदेशी काऊ में अंतर पहचानना बहुत ही सरल है| सबसे पहला अंतर होता है गौमाता का कंधा (अर्थात गौमाता की पीठ पर ऊपर की और उठा हुआ कुबड़ जिसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है), विदेशी काऊ में यह नहीं होता है एवं उसकी पीठ सपाट होती है| दूसरा अंतर होता है गौमाता के गले के नीचे की त्वचा जो बहुत ही झूलती हुई होती है जबकि विदेशी काऊ के गले के नीचे की त्वचा झूलती हुई ना होकर सामान्य एवं कसीली होती है| तीसरा अंतर होता है गौमाता के सिंग जो कि सामान्य से लेकर काफी बड़े आकार के होते है जबकि विदेशी काऊ के सिंग होते ही नहीं है या फिर बहुत छोटे होते है| चौथा अंतर होता है गौमाता कि त्वचा का अर्थात गौमाता कि त्वचा फैली हुई, ढीली एवं अतिसंवेदनशील होती है जबकि विदेशी काऊ की त्वचा काफी संकुचित एवं कम संवेदनशील होती है| 

केले खाते समय सावधान.

केले खाते समय सावधान
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सभी से विनती है कि , इस मेसेज को ध्यान से पढ़ें और विचार करें तत्पश्चात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फॉर्वर्ड  करें  २५/- से ३०/- रु डज़न इस दर से मृत्यु बेची जा रही है. मेरी सबसे विनती है कि सावधान रहें .

मित्रों हम सभी केले पसंद करते हैं और इनका भरपूर स्वाद उठाते हैं परंतु अभी बाज़ार में आने वाले केले  कार्बाइडयुक्त पानी में भिगाकर पकाए जा रहे हैं , इस प्रकार के केले खाने से १००% कॅन्सर या पेट का विकार हो सकता है.  इसलिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें और ऐसे केले ना खाएँ .

परंतु केले को कार्बाइड का उपयोग करके पकाया है इसे कैसे पहचानेंगे :-

यदि केले को प्राकृतिक तरीके से पकाया है तो उसका डंठल काला पड जाता है  और केले का रंग गर्द पीला हो जाता है . कृपया नीचे दिए फोटो को देखें साथ ही केले पर थोड़े बहुत काले दाग रहते हैं . परंतु यदि केले को कारबाइड का इस्तेमाल करके पकाया गया है तो उसका डंठल हरा होगा और केले का रंग लेमन यलो अर्थात नींबुई पीला होगा इतना ही नही ऐसे केले का रंग एकदम साफ पीला होता है उसमे कोई दाग धब्बे नहीं होते कृपया नीचे दिए फोटो को देखें.

कारबाइड आख़िर क्या है , यदि कारबाइड को पानी में मिलाएँगे तो उसमें से उष्मा (हीट) निकलती है और अस्यतेलएने गॅस का निर्माण होता है जिससे गाँव देहातों में गॅस कटिंग इत्यादि का काम लिया जाता है अर्थात इसमें इतनी कॅलॉरिफिक वॅल्यू होती है  की उससे एल पी गी गॅस को भी प्रतिस्थापित किया जा सकता है . जब किसी केले के गुच्छे को ऐसे केमिकल युक्त पानी में डुबाया जाता है तब उष्णता  केलों में उतरती है और केले पक जाते हैं , इस प्रक्रिया को उपयोग करने वाले व्यापारी इतने होशियार नहीं होते हैं कि उन्हें  पता हो की किस मात्रा के केलों के लिए कितने तादाद में इस केमिकल का उपयोग  करना है बल्कि वे इसका अनिर्बाध प्रयोग  करते हैं जिससे केलों में अतिरिक्त उष्णता का समावेश हो जाता है जो हमारे पेट में जाता है जिससे कि :-

1. पाचन्तन्त्र में खराबी आना शुरू हो जाती है , 2. आखों में जलन , 3. छाती में तकलीफ़ , 4. जी मिचलाना , 5. पेट दुखना , 6. गले मैं जलन , 7. अल्सर , 8. तदुपरांत ट्यूमर का निर्माण भी हो सकता है .

इसीलिए अनुरोध है की इस प्रकार के केलों का बहिष्कार किया जाए , इसी तरीके से आमों को भी पकाया जा रहा है परंतु जागरूकता से महाराष्ट्र में इस वर्ष लोगों ने कम आम खाए तब जा के आम के व्यापारियों की आखें खुली , अतः यदि कारबाइड से पके केलों और फलों का भी हम संपूर्ण रूप से बहिष्कार करेंगे तो ही हमें नैसर्गिक तरीके से पके स्वास्थ्यवर्धक केले और फल बेचने हेतु व्यापारी बाध्य होंगे अन्यथा हमारा स्वास्थ्य ख़तरे मैं है ये समझा जाए .

कृपया जन जागृति के लिये अविलंब फ़ॉर्वर्ड करें








Thursday, 25 August 2016

स्वस्थ रहने के स्वर्णिम सूत्र.

स्वस्थ रहने के स्वर्णिम सूत्र

-सदा ब्रह्ममुहूर्त (पातः 4-5 बजे) में उठना चाहिए।
इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य, प्राणवायु,
प्रसन्नता, मेघा, बुद्धि की वर्षा करती है।

-बिस्तर से उठते ही मूत्र त्याग के पश्चात उषा पान
अर्थात बासी मुँह 2-3 गिलास शीतल जल के सेवन
की आदत सिरदर्द, अम्लपित्त, कब्ज, मोटापा,
रक्तचाप, नैत्र रोग, अपच सहित कई रोगों से
हमारा बचाव करती है।

-स्नान सदा सामान्य शीतल जल से करना चाहिए।
(जहाँ निषेध न हो)

-स्नान के समय सर्वप्रथम जल सिर पर
डालना चाहिए, ऐसा करने से मस्तिष्क
की गर्मी पैरों से निकल जाती है।

-दिन में 2 बार मुँह में जल भरकर, नैत्रों को शीतल जल
से धोना नेत्र दृष्टि के लिए लाभकारी है।

-नहाने से पूर्व, सोने से पूर्व एवं भोजन के पश्चात् मूत्र
त्याग अवश्य करना चाहिए। यह आदत आपको कमर
दर्द, पथरी तथा मूत्र सम्बन्धी बीमारियों से
बचाती है।

-सरसों, तिल या अन्य औषधीय तेल की मालिश
नित्यप्रति करने से वात विकार,, बुढ़ापा, थकावट
नहीं होती है। त्वचा सुन्दर , दृष्टि स्वच्छ एवं शरीर
पुष्ट होता है।

-शरीर की क्षमतानुसार प्रातः भ्रमण, योग,
व्यायाम करना चाहिए।
अपच, कब्ज, अजीर्ण,
मोटापा जैसी बीमारियों से बचने के लिए भोजन
के 30 मिनट पहले तथा 30 मिनट बाद तक जल
नहीं पीना चाहिए। भोजन के साथ जल
नहीं पीना चाहिए। घूँट-दो घूँट ले सकते हैं।
दिनभर में 3-4 लीटर जल थोड़ा-थोड़ा करके पीते
रहना चाहिए।

-भोजन के प्रारम्भ में मधुर-रस (मीठा), मध्य में अम्ल,
लवण रस (खट्टा, नमकीन) तथा अन्त में कटु, तिक्त,
कषाय (तीखा, चटपटा, कसेला) रस के
पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

-भोजन के उपरान्त वज्रासन में 5-10 मिनट
बैठना तथा बांयी करवट 5-10 मिनट
लेटना चाहिए।

-भोजन के तुरन्त बाद दौड़ना, तैरना, नहाना, मैथुन
करना स्वास्थ्य के बहुत हानिकारक है।

-भोजन करके तत्काल सो जाने से
पाचनशक्ति का नाश हो जाता है जिसमें
अजीर्ण, कब्ज, आध्मान, अम्लपित्त
जैसी व्याधियाँ हो जाती है। इसलिए
सायं का भोजन सोने से 2 घन्टे पूर्व हल्का एवं
सुपाच्य करना चाहिए।

-शरीर एवं मन को तरोताजा एवं क्रियाशील रखने
के लिए औसतन 6-7 घन्टे की नींद आवश्यक है।

-गर्मी के अलावा अन्य ऋतुओं में दिन में सोने एवं
रात्री में अधिक देर तक जगने से शरीर में भारीपन,
ज्वर, जुकाम, सिर दर्द एवं अग्निमांध होता है।

-दूध के साथ दही, नीबू, नमक, तिल उड़द, जामुन,
मूली, मछली, करेला आदि का सेवन
नहीं करना चाहिए। त्वचा रोग एवं ।ससमतहल होने
की सम्भावना रहती है।

-स्वास्थ्य चाहने वाले व्यक्ति को मूत्र, मल, शुक्र,
अपानवायु, वमन, छींक, डकार, जंभाई, प्यास, आँसू
नींद और परिश्रमजन्य श्वास के वेगों को उत्पन्न
होने के साथ ही शरीर से बाहर निकाल
देना चाहिए।

-रात्री में सोने से पूर्व दाँतों की सफाई,
नैत्रों की सफाई एवं पैरों को शीतल जल से धोकर
सोना चाहिए।

-रात्री में शयन से पूर्व अपने किये गये
कार्यों की समीक्षा कर अगले दिन की कार्य
योजना बनानी चाहिए। तत्पश्चात् गहरी एवं
लम्बी सहज श्वास लेकर शरीर को एवं मन
को शिथिल करना चाहिए। शान्त मन से अपने
दैनिक क्रियाकलाप, तनाव, चिन्ता, विचार सब
परात्म चेतना को सौंपकर निश्चिंत भाव से
निद्रा की गोद में जाना चाहिए।

गौ घृत की महिमा एवं सम्पूर्ण फायदे:-

गौ घृत की महिमा एवं सम्पूर्ण फायदे:-

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यज्ञ में देशी गाय के घी की आहुतियां देने से पर्यावरण शुध्द होता है गाय के घी में चावल मिलाकर यज्ञ में आहुतियां देने से इथिलीन आक्साइड और फाममोल्डिहाइड नामक यौगिक गैस के रूप में उत्पन्न होते हैं इससे प्राण वायु शुध्द होती है ये दोनों यौगिक जीवाणरोधक होते हैं-

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प्रातः सूर्योदय के समय एवं सायंकाल सूर्यास्त के समय गाय का घी और चावल मिलाकर दो-दो आहूतियां मंत्र के साथ देने पर आसपास का वातावरण कीटाणुरहित हो जाता है-




गाय के  घी से आहुतियां देने पर यह देखा गया है कि जितनी दूर तक यज्ञ के धुएं का प्रभाव फैलता है उतनी ही दूर तक वायुमंडल में किसी प्रकार के कीटाणु नहीं रहते है और वह क्षेत्र पूरी तरह से कीटाणुओं से मुक्त हो जाता है-कृत्रिम वर्षा कराने के लिए वैज्ञानिक, प्रोपलीन आक्साइड गैस का प्रयोग करते हैं-गाय के घी से आहुति देने पर यह गैस प्राप्त होती है। प्राचीन काल में भू-जल का उपयोग कृषि में सिंचाई के लिए नहीं किया जाता था-यज्ञ होते रहने से समय-समय पर वर्षा होती रहती थी-

शरीर में पहुंचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता हैं । अग्नि में गाय का घी कि आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है,वहाँ तक का सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकरणों से मुक्त हो जाता हैं । सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डालने से एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती हैं जो अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं हैं -

अब जाने रोगों में इसका प्रभाव-

कहते है पुराना घी गुणी होता है जी हाँ ये सच है जितना ही गाय का घी पुराना हो उतना ही गुणी हो जाता है पुराना घी तीक्ष्ण, खट्टा, तीखा, उष्ण, श्रवण शक्ति को बढ़ाने वाला घाव को मिटाने वाला, योनि रोग, मस्तक रोग, नेत्र रोग, कर्ण रोग, मूच्छा, ज्वर, श्वांस, खांसी, संग्रहणी, उन्माद, कृमि, विष आदि दोषों को नष्ट करता है। दस वर्ष पुराने घी को कोंच, ग्यारह वर्ष पुराने घी को महाघृत कहते हैं-

स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए प्रतिदिन रात्रि को सोते समय गो-दो बूंद देशी गाय का गुनगुना घी दोनों नाक के छेदों में डालें। यह घी रात भर मस्तिष्क को प्राणवायु पहुंचाता रहता है और विद्युत तरंगों से मस्तिष्क को चार्ज करता रहता है। इससे मस्तिष्क की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। यदि यह क्रिया प्रातः, अपराह्न और रात को सोते समय  कई माह तक की जाती रहे तो श्वास के प्रवाह में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं और अनेक पुराने रोग ठीक हो जाते हैं-

शुष्कता, सूजन, रक्तस्राव, सर्दी, सायनस संक्रमण, नासिका गिल्टी आदि ठीक हो जाते हैं और वायु मार्ग खुल जाने से श्वास की बाधा दूर हो जाती है। नाक में घी डालने के साथ-साथ दो बूंद घी नाभि में डालें और फिर अंगुली से दोनों ओर थोड़ी देर घुमाएं। गाय का घी अपने हाथ से पांव के तलवों पर मालिश करें, इससे बहुत अच्छी नींद आती है, शांति और आनन्द प्राप्त होता है-

देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है-

गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधिय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते । गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है-

गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रीस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रीस में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है-


यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा , धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है-

गाय के घी के उपयोग-

गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है-

गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है-गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है। गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है-

आयुर्वेद विशेषज्ञो के अनुसार अनिद्रा का रोगी शाम को दोनों नथुनो में गाय के घी की दो – दो बूंद डाले और रात को नाभि और पैर के तलुओ में गौघृत लगाकर लेट जाय तो उसे प्रगाढ़ निद्रा आ जायेगी-


नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है- गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है-

गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है-
आपको यदि अगर अधिक कमजोरी लगे तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें-

गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है-

गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है याददाश्त तेज होती है इसलिए पहले के लोगो में उर्जा और ज्ञान का अभाव नहीं था मुंह-जबानी पूरा ग्रन्थ रट लिया करते थे -

हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए-हिचकी स्वयं रुक जाएगी-

गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है-

हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा-

गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है। देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है-

गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है-

हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है-

बीस से पच्चीस ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है-

सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा-

फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है-

दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा-

जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है-

संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी-

एक बात याद रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है-

एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है-

गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेसट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है-

गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है-

घी और छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है -

तो फिर अभी भी सोच रहे है आप आज से ही गाय का शुध घी घर लाये कुछ खाए और कुछ पुराना होने को रख दे ये सोच कर कि कभी न कभी आपको इसकी जरुरत पड़ सकती

Wednesday, 24 August 2016

☘ *केल्शियम फिर से बनने लगेगा* ☘

☘ *केल्शियम फिर से
बनने लगेगा* ☘
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👉 केल्शियमकि कमि
👉 विटामिन D-3 कि कमि
👉 B-12 कमि ,
👉 शुक्र धातु कि कमि ,
👉 लुब्रिकेट्स ( शरिर के जोडो के अंदरका चिकना पदाथँ )कम होने के होने वाले ददँ,
👉 आेस्ट्रियो आथँराईटिस ,
👉 आेस्ट्रियो पोरोसिस
👉 धुंटनो का धीस जाना
👉 धुंटनो मे गैप पड जाना.
👉 आेपरेशन के बाद धुंटनो मे ददँ

उपर बताई गई सभी तकलिफो का रामबाण ईलाज संजिवनी द्वारा सटिक ईलाज किया गया है

रामबाण आैषधि योग
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👉 सफेद मुसलि 50 GMs
👉 अश्वगंधा 30 GMs
👉 शतावर जड. 20 GMs
👉 ईलायचि 10 GMs
👉 गोखरु 30 GMs
👉 प्रवाल पिष्टि 10 GMs
👉 कुकुडन्तांक भस्म. 05 GMs
👉 शंख भस्म. 10 GMs
👉 मुक्ता शुकित भस्म. 05 GMs
👉 कपदिँका भस्म. 10 GMs
👉 सुवणँ माक्षिक भस्म 5 GMs
👉 हाडँजोड. 10 GMs

👉 उपर बताई गई आैषधि पंसारि से आैर सभी भस्म सिफँ बैधनाथ कंपनि कि हि ले.

सभी को मिक्स करके चूरन बनाकर सुबह शाम आधा -आधा चमच लेकर 150 ml दूध मे मिलाकर सुबह शाम ले.

⭕ 10 दिनो के अंदर हि अापके धुंटनो मे बिलकुल आराम दिखने लगेगा. पर 3 महिने सेवन करना है.

⭕ आैपरेशन कि भी कोई जरुरत नहि पडेगी

⭕ ईसमे कुदरति केल्शियम है तो , केल्शियम कि रोज बरोज कि ऐलोपैथिक दवाई कि जरुरत नहि ,

⭕ जोंईन्ट रिप्लेसमेंट करवाने कि जरुरत नहि , ये जोईन्ट ठीक करता है.

⭕ विटामिन्स -मिनरल्स खाने कि जरुरत नहि , ईसमे विटामिन्स है

⭕ बि -१२ भी भरपुर होता है तो ईन्जेक्शन नहि लेने पडेगे आपको

⭕ विटामिन D-3 का कुदरति स्ञोत है . तो उसकि गोलियो कि जरुरत नहि

⭕ जिन लोगो को धुंटनो का ददँ है वो अवश्य सेवन करे

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सुचना : इन उपायों को आजमाने से पूर्व चिकित्सक की सलाह अवश्य लें |